राजभाषा विभाग

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गृह मंत्रालय, भारत सरकार

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   चम्‍पा का राजकुमार
+  डॉ प्रियंका सारस्वत(संपादक)
चम्‍पा का राजकुमार

चम्पा प्रदेश का राजुमार था- हेमन्त । सभी उसे फूलों के राजकुमार के नाम से जानते थे । जितना उसकी वाणी में जादू था, उतना ही वह सुन्दर भी था ।

हेमन्त के पिता चम्पावत का बहुत लम्बा-चौड़ा साम्राज्य था ।

समय बीतता गया । धीरे-धीरे राजकुमार हेमन्त बड़ा होने लगा । महारानी फूली न समाती । देवदासियां राजकुमार को झुला-झुलाकर खुद मस्ती से झूला झूलती ।

महाराज चम्पावत अत्यंत वृद्ध हो चले थे । एक दिन जब उन्हें लगा कि अब वह अधिक जीवन नहीं जी सकते तो उन्होंने राजकुमार को पास बुलाया और प्रेम से कहा-`बेटा ! अब मैं दूसरे लोक चला जाऊंगा । तुम अभी छोटे हो । सभी से न्याय और प्रेम का व्यवहार करना । हमारे राज्य में कभी भी प्रजा दुखी नहीं रही । प्रजा भगवान का रूप होती है । कभी राज्य में संकट पड़े तो फूलों की देवी का ध्यान करना... ।`

`पिताजी! मैं छोटा नहीं हूं । मैं तो चम्पा प्रदेश का राजकुमार हूं । आप निश्चिन्त रहें । देवदासियों और स्वर्णपरियों का बहुत बड़ा समूह सदा मेरे साथ रहता है । मैं कभी भी महाराज के आचरणों का उल्लंघन नहीं कर सकता...। `

एक दिन राजकुमार शिकार करने जंगल गया तो रास्ता भटक गया । कई दिनों तक राजमहल न लौट सका । इधर महाराज चम्पावत स्वर्ग सिधार गए । हेमन्त लौटा, तो निराश होकर बहुत रोया । महाराज से राजमहल की रहस्य भरी राजकीय बातें भी वह न सीख सका, इसका उसे बहुत दुःख हुआ ।

पुष्पवाटिका में राजकुमार अकेला बैठा था । खिन्न और उदास । तभी महके हुए फूलों से एक परी दौड़ती हुई आई और कहने लगी, `राजकुमार ! मैं पुष्प-परी हूं । इसी राजमहल में पीढ़ियों से रहती हूं । तुम क्यों उदास होते हो । संसार में आवागमन का चक्र सदियों से चलता आ रहा है । हर पुरानी वस्तु का स्थान नई वस्तु ले लेती है । तुम घबराओ नहीं, यह लो मेरे फूलों का उपहार । इसे तुम सदैव अपने साथ रखना, कभी भी दुखी नहीं रहोगे ।` कह कर परी न जाने कहां खो गई ।

कुछ समय बीता । राजकुमार हेमन्त की न्यायप्रियता और व्यवस्थित शासन की चर्चा सभी साम्राज्यों में होने लगी ।

वसन्त ऋतु में हर वर्ष ही राजमहल में `फूलों का महोत्सव` बड़े धूमधाम से मनाया जाता । देश-विदेश तक के सभी बेसहारा लोगों को मुंहमांगा धन-वैभव बांटा जाता ।

प्रजा के लिए यह रामराज्य था । एक दिन राजकुमार हेमन्त उत्सव के बाद `फूलों की देवी` के दर्शन के लिए गया, तो ऐरावत प्रदेश के राजा चन्द्रसेन ने चम्पा प्रदेश पर चढ़ाई कर दी । राजकुमार लौटा, तो एकाएक राजमहल को अजनबी फौजों से घिरा हुआ देख कर आश्चर्यचकित हो उठा । परन्तु वह घबराया नहीं । जैसे ही वह राजमहल के मुख्य द्वार पर पहुंचा, तो द्वारपालों ने उसे बन्दी बना लिया । उदार राजकुमार ने कहा-`सैनिक ! क्यों बन्दी बनाते हो ? मैंने तो अपने किसी भी अपराधी तक को बन्दी नहीं बनाया । जहां चाहते हो, मैं साथ चलता हूं, चलो ।`

अजनबी राजा राजकुमार हेमन्त को आया देख कर आग बबूला हो उठा और तपाक से बोल पड़ा- `गुलाम राजकुमार ! बोलो अब क्या चाहते हो.. कुछ शेष रह गया है।`

`महाराज I अपशब्द कहकर अपनी विद्वता का मूल्य मत घटाओ । यह उस विराट सत्‍ता का राजमहल है, मेरा नहीं । आपने मेरे साथ नहीं स्वयं अपने साथ छल किया है। मेरे लिए समस्त विश्व प्रजा है और सम्पूर्ण धरती राजमहल । यह लो मेरे स्वर्णमय खजाने की चाबी । जब भी प्रजा पर संकट पड़े तो वहां मेरे पूर्वजों का ढेर सारा धन-वैभव गड़ा है । प्रजा को सदैव सुखी रखना । प्रजा सहित आपका कल्याण हो । अच्छा महाराज, महापुरूष कभी नश्वर सत्ता से मोह नहीं करते ।` यह कह कर हेमन्त चल दिया।

यह सुन कर मानो राजा चन्द्रसेन की तो आंखें खुल गईं । वह दौड़ते हुए राजकुमार हेमन्त के पैरों में गिर पड़ा ।

हेमन्त पुनः प्रेम से राजपाट चलाने लगा ।

 

(स्वर : श्री सतेंद्र दहिया )
    

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