राजभाषा विभाग

Department of Official Language
गृह मंत्रालय, भारत सरकार

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+ डॉ दिनेश चमोला
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ढ़ोंगी सियार

बहुत समय पहले मिथिला के जंगलों में पहले एक सियार रहता था। वह बहुत आलसी था। पेट भरने के लिए खरगोशों व चूहों का पीछा करना व उनका शिकार करना उसे बड़ा भारी लगता था। शिकार करने में परिश्रम तो करना ही पडता है। दिमाग उसका शैतानी था। यही तिकड़म लगाता रहता कि कैसे ऐसी जुगत लड़ाई जाए जिससे बिना हाथ-पैर हिलाए भोजन मिलता रहे। खाया और सो गए। एक दिन इसी सोच में डूबा वह सियार एक झाड़ी में दुबका बैठा था।

बाहर चूहों की टोली उछल-कूद व भाग-दौड़ करने में लगी थी। उनमें एक मोटा-सा चूहा था, जिसे दूसरे चूहे `सरदार` कहकर बुला रहे थे और उसका आदेश मान रहे थे। सियार उन्हें देखता रहा। उसके मुंह से लार टपकती रही। फिर उसके दिमाग में एक तरकीब आई।

जब चूहे वहां से गए तो उसने दबे पांव उनका पीछा किया। कुछ ही दूर उन चूहों के बिल थे। सियार वापस लौटा। दूसरे दिन प्रातः ही वह उन चूहों के बिल के पास जाकर एक टांग पर खड़ा हो गया। उसका मुंह उगते सूरज की ओर था। आंखें बंद थी।

चूहे बिलों से निकले तो सियार को उस अनोखी मुद्रा में खड़े देखकर वे बहुत चकित हुए। एक चूहे ने सियार के थोड़ा निकट जाकर पूछा `सियार मामा, तुम इस प्रकार एक टांग पर क्यों खड़े हो?`

सियार एक आंख खोलकर बोला `मूर्ख, तूने मेरे बारे में नहीं सुना कभी? मैं चारों टांगें नीचे टिका दूंगा तो धरती मेरा बोझ नहीं सम्भाल पाएगी। यह डोल जाएगी। साथ ही तुम सब नष्ट हो जाओगे। तुम्‍हारे ही कल्याण के लिए मुझे एक टांग पर खड़े रहना पड़ता है।`

चूहों में खुसर-फुसर हुई। वे सियार के निकट आकर खड़े हो गए। चूहों के सरदार ने कहा `हे महान सियार, हमें अपने बारे में कुछ बताइए।`

सियार ने ढोंग रचा `मैंने सैकड़ों वर्ष हिमालय पर्वत पर एक टांग पर खड़े होकर तपस्या की।  मेरी तपस्या समाप्त होने पर सभी देवताओं ने मुझ पर फूलों की वर्षा की। भगवान ने प्रकट होकर कहा कि मेरे तप से मेरा भार इतना हो गया है कि मैं अपने चारों पैर धरती पर रखूं तो धरती गिरती हुई ब्रह्मांड को फोड़कर दूसरी ओर निकल जाएगी। धरती मेरी कृपा पर ही टिकी रहेगी। तबसे मैं एक टांग पर ही खड़ा हूं। मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण दूसरे जीवों को कष्ट हो।`

सारे चूहों का समूह महातपस्वी सियार के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। एक चूहे ने पूछा `तपस्वी मामा, आपने अपना मुंह सूरज की ओर क्यों कर रखा है?`

सियार ने उत्तर दिया `सूर्य की पूजा के लिए।`

`और आपका मुंह क्यों खुला है?` दूसरे चूहे ने पूछा ।

`हवा खाने के लिए! मैं केवल हवा खाकर ज़िंदा रहता हूं। मुझे खाना खाने की ज़रुरत नहीं पड़ती। मेरे तप का बल हवा को ही पेट में भांति-भांति के पकवानों में बदल देता है।` सियार बोला।

उसकी इस बात को सुनकर चूहों पर ज़बरदस्त प्रभाव पड़ा। अब सियार की ओर से उनका सारा भय जाता रहा। वे उसके और निकट आ गए। अपनी बात का असर चूहों पर होता देख मक्कार सियार दिल ही दिल में खूब हंसा। अब चूहे महातपस्वी सियार के भक्त बन गए। सियार एक टांग पर खड़ा रहता और चूहे उसके चारों ओर बैठकर ढोलक, मजीरे, खड़ताल और चिमटे लेकर उसके भजन गाते।

सियार सियारम् भजनम् भजनम।

भजन कीर्तन समाप्त होने के बाद चूहों की टोलियां भक्ति रस में डूबकर अपने बिलों में घुसने लगती तो सियार सबसे बाद के तीन-चार चूहों को दबोचकर खा जाता। फिर रात भर आराम करता, सोता और डकारें लेता।

सुबह होते ही फिर वह चूहों के बिलों के पास आकर एक टांग पर खड़ा हो जाता और अपना नाटक चालू रखता। धीरे-धीरे चूहों की संख्या कम होने लगी। चूहों के सरदार की नज़र से यह बात छिपी नहीं रही। एक दिन सरदार ने सियार से पूछ ही लिया `हे महात्मा सियार, मेरी टोली के चूहे मुझे कम होते नज़र आ रहे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है?`

सियार ने आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठाया `हे चतुर मूषक, यह तो होना ही था। जो सच्चे मन से मेरी भक्ति करेगा, वह सशरीर बैकुण्ठ को जाएगा। बहुत से चूहे भक्ति का फल पा रहे हैं।`

चूहों के सरदार ने देखा कि सियार मोटा हो गया है। कहीं उसका पेट ही तो वह बैकुण्ठ लोक नहीं है, जहां चूहे जा रहे हैं?

चूहों के सरदार ने बाकी बचे चूहों को चेताया और स्वयं उसने दूसरे दिन सबसे बाद में बिल में घुसने का निश्चय किया। भजन समाप्त होने के बाद चूहे बिलों में घुसे। सियार ने सबसे अंत के चूहे को दबोचना चाहा।

चूहों का सरदार पहले ही चौकन्ना था। वह दांव मारकर सियार का पंजा बचा गया। असलियत का पता चलते ही वह उछलकर सियार की गर्दन पर चढ़ गया और उसने बाकी चूहों को हमला करने के लिए कहा। साथ ही उसने अपने दांत सियार की गर्दन में गाड़ दिए। बाकी चूहे भी सियार पर झपटे और सबने कुछ ही देर में महात्मा सियार को कंकाल सियार बना दिया। केवल उसकी हड्डियों का पिंजर बचा रह गया।

सीखः   ढोंग कुछ ही दिन चलता है, फिर ढोंगी को अपनी करनी का फल मिलता ही है।

(स्वर : श्री सतेंद्र दहिया )
    

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