राजभाषा विभाग

Department of Official Language
गृह मंत्रालय, भारत सरकार

 प्रसिद्ध लघु कहानियाँ
+ रविंद्रनाथ टैगोर
+ प्रेमचंद
+ जयशंकर प्रसाद
+ यशपाल
+ चंद्रधर शर्मा गुलेरी
+ सआदत हसन मंटो
+ फणीश्वरनाथ रेणु
+ निर्मल वर्मा
+ नागार्जुन
+ जैनेन्द्र कुमार
+ यशपाल
+ भीष्म साहनी
+ महीप सिंह
+ सुदर्शन
+ कृष्णा सोबती
+ सुभद्रा कुमारी चौहान
- पंचतंत्र की कहानियाँ
   रंगा सियार
   खरगीश की चतुराई
   घंटीधारी ऊंट
   झूठी शान
   दुश्मन का स्वार्थ
   बंदर का कलेजा
   बड़े नाम का चमत्कार
   मित्र की सलाह
   रंग में भंग
   सच्चे मित्र
   एक और एक ग्यारह
   गजराज व मूषकराज
   चापलूस मंडली
   ढ़ोंगी सियार
   दुष्ट सर्प
   बगुला भगत
   बिल्ली का न्याय
   मूर्ख बातूनी कछुआ
   संगठन की शक्ति
   स्वजाति प्रेम
+ डॉ दिनेश चमोला
+  डॉ प्रियंका सारस्वत(संपादक)
चापलूस मंडली

एक जंगल में एक शेर रहता था। उसके चार सेवक थे चील, भेडिया, लोमडी और चीता। चील दूर-दूर तक उड़कर समाचार लाती। चीता राजा का अंगरक्षक था। सदा उसके पीछे चलता। लोमड़ी शेर की सैक्रेटरी थी। भेड़िया गॄहमंत्री था। उनका असली काम तो शेर की चापलूसी करना था। इस काम में चारों माहिर थे। इसलिए जंगल के दूसरे जानवर उन्हें चापलूस मंडली कहकर पुकारते थे। शेर शिकार करता। जितना खा सकता वह खाकर बाकी अपने सेवकों के लिए छोड़ जाया करता था। उससे मजे से चारों का पेट भर जाता। एक दिन चील ने आकर चापलूस मंडली को सूचना दी `भाईयो! सड़क के किनारे एक ऊंट बैठा है।`

भेड़िया चौंका `ऊंट! किसी काफिले से बिछुड गया होगा।`

चीते ने जीभ चटकाई `हम शेर को उसका शिकार करने को राजी कर लें तो कई दिन दावत उड़ा सकते हैं।`

लोमड़ी ने घोषणा की `यह मेरा काम रहा।`

लोमड़ी शेर राजा के पास गई और अपनी जुबान में मिठास घोलकर बोली `महाराज, दूत ने खबर दी है कि एक ऊंट सड़क किनारे बैठा है। मैंने सुना हैं कि मनुष्य के पाले जानवर के मांस का स्वाद ही कुछ और होता हैं। बिल्कुल राजा-महाराजाओं के काबिल। आप आज्ञा दें तो आपके शिकार का ऐलान कर दूं?`

शेर लोमडी की मीठी बातों में आ गया और चापलूस मंडली के साथ चील द्वारा बताई जगह जा पहुंचा। वहां एक कमजोर-सा ऊंट सडक किनारे निढाल बैठा था। उसकी आंखें पीली पड़ चुकी थीं। उसकी हालत देखकर शेर ने पूछा `क्यों भाई तुम्हारी यह हालात कैसे हुई?`

ऊंट कराहता हुआ बोला `हे जंगल के राजा! आपको नहीं पता इंसान कितना निर्दयी होता हैं। मैं एक ऊंटो के काफिले में एक व्यापार माल ढो रहा था। रास्ते में मैं बीमार पड़ गया। माल ढोने लायक नहीं उसने मुझे यहां मरने के लिए छोड़ दिया। आप ही मेरा शिकार कर मुझे मुक्ति दीजिए।`

ऊंट की कहानी सुनकर शेर को दुख हुआ। अचानक उसके दिल में राजाओं जैसी उदारता दिखाने की जोरदार इच्छा हुई। शेर ने कहा `ऊंट, तुम्हें कोई जंगली जानवर नहीं मारेगा। मैं तुम्हें अभय देता हूं। तुम हमारे साथ चलोगे और उसके बाद हमारे साथ ही रहोगे।`

चापलूस मंडली के चेहरे लटक गए। भेड़िया फुसफुसाया `ठीक हैं। हम बाद में इसे मरवाने की कोई तरकीब निकाल लेंगे। फिलहाल शेर का आदेश मानने में ही भलाई हैं।`

इस प्रकार ऊंट उनके साथ जंगल में आया। कुछ ही दिनों में हरी घास खाने व आराम करने से वह स्वस्थ हो गया। शेर राजा के प्रति वह ऊंट बहुत कॄतज्ञ हुआ। शेर को भी ऊंट का निस्वार्थ प्रेम और भोलापन भाने लगा। ऊंट के तगड़ा होने पर शेर की शाही सवारी ऊंट के ही आग्रह पर उसकी पीठ पर निकलने लगी वह चारों को पीठ पर बिठाकर चलता।

एक दिन चापलूस मंडली के आग्रह पर शेर ने हाथी पर हमला कर दिया। दुर्भाग्य से हाथी पागल निकला। शेर को उसने सूंड से उठाकर पटक दिया। शेर उठकर बच निकलने में सफल तो हो गया, पर उसे चोंटें बहुत लगीं।

शेर लाचार होकर बैठ गया। शिकार कौन करता? कई दिन न शेर ने ने कुछ खाया और न सेवकों ने। कितने दिन भूखे रहा जा सकता हैं? लोमड़ी बोली `हद हो गई। हमारे पास एक मोटा ताजा ऊंट हैं और हम भूखे मर रहे हैं।`

चीते ने ठंडी सांस भरी `क्या करें? शेर ने उसे अभयदान जो दे रखा हैं। देखो तो ऊंट की पीठ का कूबड कितना बड़ा हो गया हैं। चर्बी ही चर्बी भरी हैं इसमें।`

भेड़िए के मुंह से लार टपकने लगी `ऊंट को मरवाने का यही मौका हैं दिमाग लड़ाकर कोई तरकीब सोचो।`

लोमड़ी ने धूर्त स्वर में सूचना दी `तरकीब तो मैंने सोच रखी हैं। हमें एक नाटक करना पडेगा।`

सब लोमड़ी की तरकीब सुनने लगे। योजना के अनुसार चापलूस मंडली शेर के पास गई। सबसे पहले चील बोली `महाराज, आपको भूखे पेट रहकर मरना मुझसे नहीं देखा जाता। आप मुझे खाकर अपनी भूख मिटाइए।`

लोमडी ने उसे धक्का दिया `चल हट! तेरा मांस तो महाराज के दांतों में फंसकर रह जाएगा। महाराज, आप मुझे खाइए।`

भेडिया बीच में कूदा `तेरे शरीर में बालों के सिवा हैं ही क्या? महाराज मुझे अपना भोजन बनाएंगे।`

अब चीते की बारी थी। वह बोला `नहीं! भेडिए का मांस खाने लायक नहीं होता। मालिक, आप मुझे खाकर अपनी भूख शांत कीजिए।`

चापलूस मंडली का नाटक अच्छा था। अब ऊंट को तो कहना ही पड़ा `नहीं महाराज, आप मुझे मारकर खा जाइए। मेरा तो जीवन ही आपका दान दिया हुआ हैं। मेरे रहते आप भूखों मरें, यह नहीं होगा।`

चापलूस मंडली तो यही चाहती थी। सभी एक स्वर में बोले `यही ठीक रहेगा, महाराज! अब तो ऊंट खुद ही कह रहा हैं।`

चीता बोला `महाराज! आपको संकोच हो तो हम इसे मार दें?` चीता व भेड़िया एक साथ ऊंट पर टूट पडे और ऊंट मारा गया।

सीखः चापलूसों की दोस्ती हमेशा खतरनाक होती है।

(स्वर : श्री सतेंद्र दहिया )
    

अस्वीकरण संपर्क करें सामग्री राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई है विकसित और रखरखाव : राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र (एनआईसी)
1