राजभाषा विभाग

Department of Official Language
गृह मंत्रालय, भारत सरकार

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+ पंचतंत्र की कहानियाँ
+ डॉ दिनेश चमोला
+  डॉ प्रियंका सारस्वत(संपादक)
दो बैलों की कथा

जानवरों में गधा सबसे ज्यादा बुद्धिमान समझा जाता है। हम जब किसी आदमी को पहले दर्जे का बेवकूफ कहना चाहते हैंतो उसे गधा कहते हैं। गधा सचमुच बेवकूफ है या उसके सीधेपनउसकी निरापद सहिष्णुता ने उसे यह पदवी दे दी हैइसका निश्चय नहीं किया जा सकता। गायें सींग मारती हैंब्याही हुई गाय तो अनायास ही सिंहनी का रूप धारण कर लेती है। कुत्ता भी बहुत गरीब जानवर हैलेकिन कभी-कभी उसे भी क्रोध आ ही जाता हैकिन्तु गधे को कभी क्रोध करते नहीं सुनान देखा। जितना चाहो गरीब को मारोचाहे जैसी खराब,सड़ी हुई घास सामने डाल दोउसके चेहरे पर कभी असंतोष की छाया भी नहीं दिखाई देगी। वैशाख में चाहे एकाध बार कुलेल कर लेता हैपर हमने तो उसे कभी खुश होते नहीं देखा। उसके चेहरे पर स्थाई विषाद स्थायी रूप से छाया रहता है। सुख-दुःखहानि-लाभ किसी भी दशा में उसे बदलते नहीं देखा। ऋषियों-मुनियों के जितने गुण हैंवे सभी उसमें पराकाष्ठा को पहुँच गए हैंपर आदमी उसे बेवकूफ कहता है। सद्गुणों का इतना अनादर! 

कदाचित सीधापन संसार के लिए उपयुक्त नहीं है। देखिए नभारतवासियों की अफ्रीका में क्या दुर्दशा हो रही है ? क्यों अमरीका में उन्हें घुसने नहीं दिया जाताबेचारे शराब नहीं पीते,चार पैसे कुसमय के लिए बचाकर रखते हैंजी तोड़कर काम करते हैंकिसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करतेचार बातें सुनकर गम खा जाते हैं फिर भी बदनाम हैं। कहा जाता हैवे जीवन के आदर्श को नीचा करते हैं। अगर वे ईंट का जवाब पत्थर से देना सीख जाते तो शायद सभ्य कहलाने लगते। जापान की मिसाल सामने है। एक ही विजय ने उसे संसार की सभ्य जातियों में गण्य बना दिया। लेकिन गधे का एक छोटा भाई और भी हैजो उससे कम ही गधा है। और वह है `बैल`। जिस अर्थ में हम `गधाका प्रयोग करते हैंकुछ उसी से मिलते-जुलते अर्थ में `बछिया के ताऊका भी प्रयोग करते हैं। कुछ लोग बैल को शायद बेवकूफी में सर्वश्रेष्ठ कहेंगेमगर हमारा विचार ऐसा नहीं है। बैल कभी-कभी मारता भी हैकभी-कभी अड़ियल बैल भी देखने में आता है। और भी कई रीतियों से अपना असंतोष प्रकट कर देता हैअतएवं उसका स्थान गधे से नीचा है।

झूरी क पास दो बैल थे- हीरा और मोती। देखने में सुंदरकाम में चौकसडील में ऊंचे। बहुत दिनों साथ रहते-रहते दोनों में भाईचारा हो गया था। दोनों आमने-सामने या आस-पास बैठे हुए एक-दूसरे से मूक भाषा में विचार-विनिमय किया करते थे। एक-दूसरे के मन की बात को कैसे समझा जाता हैहम कह नहीं सकते। अवश्य ही उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी,जिससे जीवों में श्रेष्ठता का दावा करने वाला मनुष्य वंचित है। दोनों एक-दूसरे को चाटकर सूँघकर अपना प्रेम प्रकट करतेकभी-कभी दोनों सींग भी मिला लिया करते थेविग्रह के नाते से नहींकेवल विनोद के भाव सेआत्मीयता के भाव सेजैसे दोनों में घनिष्ठता होते ही धौल-धप्पा होने लगता है। इसके बिना दोस्ती कुछ फुसफसीकुछ हल्की-सी रहती हैफिर ज्यादा विश्वास नहीं किया जा सकता। जिस वक्त ये दोनों बैल हल या गाड़ी में जोत दिए जाते और गरदन हिला-हिलाकर चलतेउस समय हर एक की चेष्टा होती कि ज्यादा-से-ज्यादा बोझ मेरी ही गर्दन पर रहे। 

दिन-भर के बाद दोपहर या संध्या को दोनों खुलते तो एक-दूसरे को चाट-चूट कर अपनी थकान मिटा लिया करतेनांद में खली-भूसा पड़ जाने के बाद दोनों साथ उठतेसाथ नांद में मुँह डालते और साथ ही बैठते थे। एक मुँह हटा लेता तो दूसरा भी हटा लेता था। 

संयोग की बातझूरी ने एक बार गोईं को ससुराल भेज दिया। बैलों को क्या मालूमवे कहाँ भेजे जा रहे हैं। समझेमालिक ने हमें बेच दिया। अपना यों बेचा जाना उन्हें अच्छा लगा या बुराकौन जानेपर झूरी के साले गया को घर तक गोईं ले जाने में दांतों पसीना आ गया। पीछे से हांकता तो दोनों दाएँ-बाँए भागतेपगहिया पकड़कर आगे से खींचता तो दोनों पीछे की ओर जोर लगाते। मारता तो दोनों सींगे नीची करके हुंकारते। अगर ईश्वर ने उन्हें वाणी दी होती तो झूरी से पूछते-तुम हम गरीबों को क्यों निकाल रहे हो ?

हमने तो तुम्हारी सेवा करने में कोई कसर नहीं उठा रखी। अगर इतनी मेहनत से काम न चलता थाऔर काम ले लेते। हमें तो तुम्हारी चाकरी में मर जाना कबूल था। हमने कभी दाने-चारे की शिकायत नहीं की। तुमने जो कुछ खिलायावह सिर झुकाकर खा लियाफिर तुमने हमें इस जालिम के हाथ क्यों बेंच दिया ?

संध्या समय दोनों बैल अपने नए स्थान पर पहुँचे। दिन-भर के भूखे थेलेकिन जब नांद में लगाए गए तो एक ने भी उसमें मुंह नहीं डाला। दिल भारी हो रहा था। जिसे उन्होंने अपना घर समझ रखा थावह आज उनसे छूट गया। यह नया घरनया गांवनए आदमी उन्हें बेगाने-से लगते थे। 

दोनों ने अपनी मूक भाषा में सलाह कीएक-दूसरे को कनखियों से देखा और लेट गये। जब गांव में सोता पड़ गया तो दोनों ने जोर मारकर पगहा तुड़ा डाले और घर की तरफ चले। पगहे बहुत मजबूत थे। अनुमान न हो सकता था कि कोई बैल उन्हें तोड़ सकेगापर इन दोनों में इस समय दूनी शक्ति आ गई थी। एक-एक झटके में रस्सियाँ टूट गईं।

झूरी प्रातः काल सो कर उठा तो देखा कि दोनों बैल चरनी पर खड़े हैं। दोनों की गरदनों में आधा-आधा गरांव लटक रहा था। घुटने तक पांव कीचड़ से भरे हैं और दोनों की आंखों में विद्रोहमय स्नेह झलक रहा है। 

झूरी बैलों को देखकर स्नेह से गद्गद हो गया। दौड़कर उन्हें गले लगा लिया। प्रेमालिंगन और चुम्बन का वह दृश्य बड़ा ही मनोहर था। 

घर और गाँव के लड़के जमा हो गए। और तालियाँ बजा-बजाकर उनका स्वागत करने लगे। गांव के इतिहास में यह घटना अभूतपूर्व न होने पर भी महत्त्वपूर्ण थीबाल-सभा ने निश्चय कियादोनों पशु-वीरों का अभिनन्दन पत्र देना चाहिए। कोई अपने घर से रोटियां लायाकोई गुड़कोई चोकरकोई भूसी।

एक बालक ने कहा- `ऐसे बैल किसी के पास न होंगे।`

दूसरे ने समर्थन किया- `इतनी दूर से दोनों अकेले चले आए।`

तीसरा बोला- `बैल नहीं हैं वेउस जन्म के आदमी हैं।`

इसका प्रतिवाद करने का किसी को साहस नहीं हुआ। झूरी की स्त्री ने बैलों को द्वार पर देखा तो जल उठी। बोली -`कैसे नमक-हराम बैल हैं कि एक दिन वहां काम न कियाभाग खड़े हुए।`
झूरी अपने बैलों पर यह आक्षेप न सुन सका-`नमक हराम क्यों हैं ? चारा-दाना न दिया होगा तो क्या करते ?`

स्त्री ने रोब के साथ कहा-`बसतुम्हीं तो बैलों को खिलाना जानते होऔर तो सभी पानी पिला-पिलाकर रखते हैं।`

झूरी ने चिढ़ाया-`चारा मिलता तो क्यों भागते ?`

स्त्री चिढ़ गयी-`भागे इसलिए कि वे लोग तुम जैसे बुद्धुओं की तरह बैल को सहलाते नहींखिलाते हैं तो रगड़कर जोतते भी हैं। ये दोनों ठहरे कामचोरभाग निकले। अब देखूं कहां से खली और चोकर मिलता है। सूखे भूसे के सिवा कुछ न दूंगीखाएं चाहें मरें।`

वही हुआ। मजूर की बड़ी ताकीद की गई कि बैलों को खाली सूखा भूसा दिया जाए।

बैलों ने नांद में मुंह डाला तो फीका-फीकान कोई चिकनाहटन कोई रस ! 

क्या खाएं ? आशा-भरी आंखों से द्वार की ओर ताकने लगे। झूरी ने मजूर से कहा-`थोड़ीसी खली क्यों नहीं डाल देता बे ?`

`मालकिन मुझे मार ही डालेंगी।`

`चुराकर डाल आ।`

`ना दादापीछे से तुम भी उन्हीं की-सी कहोगे।`

दूसरे दिन झूरी का साला फिर आया और बैलों को ले चला। अबकी उसने दोनों को गाड़ी में जोता।

दो-चार बार मोती ने गाड़ी को खाई में गिराना चाहापर हीरा ने संभाल लिया। वह ज्यादा सहनशील था।

संध्या-समय घर पहुंचकर उसने दोनों को मोटी रस्सियों से बांधा और कल की शरारत का मजा चखाया फिर वही सूखा भूसा डाल दिया। अपने दोनों बालों को खली चूनी सब कुछ दी।

दोनों बैलों का ऐसा अपमान कभी न हुआ था। झूरी ने इन्हें फूल की छड़ी से भी छूता था। उसकी टिटकार पर दोनों उड़ने लगते थे। यहां मार पड़ी। आहत सम्मान की व्यथा तो थी ही,उस पर मिला सूखा भूसा !
नांद की तरफ आंखें तक न उठाईं।

दूसरे दिन गया ने बैलों को हल में जोतापर इन दोनों ने जैसे पांव न उठाने की कसम खा ली थी। वह मारते-मारते थक गयापर दोनों ने पांव न उठाया। एक बार जब उस निर्दयी ने हीरा की नाक पर खूब डंडे जमाये तो मोती को गुस्सा काबू से बाहर हो गया। हल लेकर भागा। हलरस्सीजुआजोतसब टूट-टाटकर बराबर हो गया। गले में बड़ी-बड़ी रस्सियाँ न होतीं तो दोनों पकड़ाई में न आते।

हीरा ने मूक-भाषा में कहा-भागना व्यर्थ है।`

मोती ने उत्तर दिया-`तुम्हारी तो इसने जान ही ले ली थी।`

`अबकी बड़ी मार पड़ेगी।`

`पड़ने दोबैल का जन्म लिया है तो मार से कहां तक बचेंगे ?`

`गया दो आदमियों के साथ दौड़ा आ रहा हैदोनों के हाथों में लाठियां हैं।

मोती बोला-`कहो तो दिखा दूं मजा मैं भीलाठी लेकर आ रहा है।`

हीरा ने समझाया-`नहीं भाई ! खड़े हो जाओ।`

`मुझे मारेगा तो मैं एक-दो को गिरा दूंगा।`

`नहीं हमारी जाति का यह धर्म नहीं है।`

मोती दिल में ऐंठकर रह गया। गया आ पहुंचा और दोनों को पकड़ कर ले चला। कुशल हुई कि उसने इस वक्त मारपीट न कीनहीं तो मोती पलट पड़ता। उसके तेवर देख गया और उसके सहायक समझ गए कि इस वक्त टाल जाना ही भलमनसाहत है।

आज दोनों के सामने फिर वही सूखा भूसा लाया गयादोनों चुपचाप खड़े रहे।

घर में लोग भोजन करने लगे। उस वक्त छोटी-सी लड़की दो रोटियां लिए निकली और दोनों के मुंह में देकर चली गई। उस एक रोटी से इनकी भूख तो क्या शान्त होतीपर दोनों के हृदय को मानो भोजन मिल गया। यहां भी किसी सज्जन का वास है। लड़की भैरो की थी। उसकी मां मर चुकी थी। सौतेली मां उसे मारती रहती थीइसलिए इन बैलों से एक प्रकार की आत्मीयता हो गई थी।

दोनों दिन-भर जातेडंडे खातेअड़तेशाम को थान पर बांध दिए जाते और रात को वही बालिका उन्हें दो रोटियां खिला जाती। प्रेम के इस प्रसाद की यह बरकत थी कि दो-दो गाल सूखा भूसा खाकर भी दोनों दुर्बल न होते थेमगर दोनों की आंखों में रोम-रोम में विद्रोह भरा हुआ था।

एक दिन मोती ने मूक-भाषा में कहा-`अब तो नहीं सहा जाता हीरा !

`क्या करना चाहते हो ?`

`एकाध को सींगों पर उठाकर फेंक दूंगा।`

`लेकिन जानते होवह प्यारी लड़कीजो हमें रोटियां खिलाती हैउसी की लड़की हैजो इस घर का मालिक हैयह बेचारी अनाथ हो जाएगी।`

`तो मालकिन को फेंक दूंवही तो इस लड़की को मारती है।

`लेकिन औरत जात पर सींग चलाना मना हैयह भूल जाते हो।`

`तुम तो किसी तरह निकलने ही नहीं देतेबताओतुड़ाकर भाग चलें।`

`हांयह मैं स्वीकार करतालेकिन इतनी मोटी रस्सी टूटेगी कैसे।`

इसका एक उपाय हैपहले रस्सी को थोड़ा चबा लो। फिर एक झटके में जाती है।`

रात को जब बालिका रोटियां खिला कर चली गई तो दोनों रस्सियां चबने लगेपर मोटी रस्सी मुंह में न आती थी। बेचारे बार-बार जोर लगाकर रह जाते थे।

साहसा घर का द्वार खुला और वह लड़की निकली। दोनों सिर झुकाकर उसका हाथ चाटने लगे। दोनों की पूंछें खड़ी हो गईं। उसने उनके माथे सहलाए और बोली-`खोल देती हूँचुपके से भाग जाओनहीं तो ये लोग मार डालेंगे। आज घर में सलाह हो रही है कि इनकी नाकों में नाथ डाल दी जाएं।`

उसने गरांव खोल दियापर दोनों चुप खड़े रहे।

मोती ने अपनी भाषा में पूंछा-`अब चलते क्यों नहीं ?`

हीरा ने कहा-`चलें तोलेकिन कल इस अनाथ पर आफत आएगीसब इसी पर संदेह करेंगे।

साहसा बालिका चिल्लाई-`दोनों फूफा वाले बैल भागे जे रहे हैंओ दादा! दादा! दोनों बैल भागे जा रहे हैंओ दादा! दादा! दोनों बैल भागे जा रहे हैंजल्दी दौड़ो।

गया हड़बड़ाकर भीतर से निकला और बैलों को पकड़ने चला। वे दोनों भागे। गया ने पीछा कियाऔर भी तेज हुएगया ने शोर मचाया। फिर गांव के कुछ आदमियों को भी साथ लेने के लिए लौटा। दोनों मित्रों को भागने का मौका मिल गया। सीधे दौड़ते चले गए। यहां तक कि मार्ग का ज्ञान रहा। जिस परिचित मार्ग से आए थेउसका यहां पता न था। नए-नए गांव मिलने लगे। तब दोनों एक खेत के किनारे खड़े होकर सोचने लगेअब क्या करना चाहिए।

हीरा ने कहा-`मुझे मालूम होता हैराह भूल गए।`

`तुम भी बेतहाशा भागेवहीं उसे मार गिराना था।`

`उसे मार गिराते तो दुनिया क्या कहती ? वह अपने धर्म छोड़ देलेकिन हम अपना धर्म क्यों छोडें ?`

दोनों भूख से व्याकुल हो रहे थे। खेत में मटर खड़ी थी। चरने लगे। रह-रहकर आहट लेते रहे थे। कोई आता तो नहीं है।

जब पेट भर गयादोनों ने आजादी का अनुभव किया तो मस्त होकर उछलने-कूदने लगे। पहले दोनों ने डकार ली। फिर सींग मिलाए और एक-दूसरे को ठेकने लगे। मोती ने हीरा को कई कदम पीछे हटा दियायहां तक कि वह खाई में गिर गया। तब उसे भी क्रोध आ गया। संभलकर उठा और मोती से भिड़ गया। मोती ने देखा कि खेल में झगड़ा हुआ चाहता है तो किनारे हट गया।

अरे ! यह क्या ? कोई सांड़ डौंकता चला आ रहा है। हांसांड़ ही है। वह सामने आ पहुंचा। दोनों मित्र बगलें झांक रहे थे। सांड़ पूरा हाथी था। उससे भिड़ना जान से हाथ धोना हैलेकिन न भिड़ने पर भी जान बचती नजर नहीं आती। इन्हीं की तरफ आ भी रहा है। कितनी भयंकर सूरत है !

मोती ने मूक-भाषा में कहा-`बुरे फंसेजान बचेगी ? कोई उपाय सोचो।`

हीरा ने चिंतित स्वर में कहा-`अपने घमंड में फूला हुआ हैआरजू-विनती न सुनेगा।`

`भाग क्यों न चलें?`

`भागना कायरता है।`

`तो फिर यहीं मरो। बंदा तो नौ दो ग्यारह होता है।`

`और जो दौड़ाए?`

तो फिर कोई उपाए सोचो जल्द!`

`उपाय यह है कि उस पर दोनों जने एक साथ चोट करें। मैं आगे से रगेदता हूँतुम पीछे से रगेदोदोहरी मार पड़ेगी तो भाग खड़ा होगा। मेरी ओर झपटेतुम बगल से उसके पेट में सींग घुसेड़ देना। जान जोखिम हैपर दूसरा उपाय नहीं है।

दोनों मित्र जान हथेली पर लेकर लपके। सांड़ को भी संगठित शत्रुओं से लड़ने का तजुरबा न था। 

वह तो एक शत्रु से मल्लयुद्ध करने का आदी था। ज्यों-ही हीरा पर झपटामोती ने पीछे से दौड़ाया। सांड़ उसकी तरफ मुड़ा तो हीरा ने रगेदा। सांड़ चाहता थाकि एक-एक करके दोनों को गिरा लेपर ये दोनों भी उस्ताद थे। उसे वह अवसर न देते थे। एक बार सांड़ झल्लाकर हीरा का अन्त कर देने के लिए चला कि मोती ने बगल से आकर उसके पेट में सींग भोंक दिया। सांड़ क्रोध में आकर पीछे फिरा तो हीरा ने दूसरे पहलू में सींगे चुभा दिया। 

आखिर बेचारा जख्मी होकर भागा और दोनों मित्रों ने दूर तक उसका पीछा किया। यहां तक कि सांड़ बेदम होकर गिर पड़ा। तब दोनों ने उसे छोड़ दिया। दोनों मित्र जीत के नशे में झूमते चले जाते थे।

मोती ने सांकेतिक भाषा में कहा-`मेरा जी चाहता था कि बचा को मार ही डालूं।`

हीरा ने तिरस्कार किया-`गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए।`

`यह सब ढोंग हैबैरी को ऐसा मारना चाहिए कि फिर न उठे।`
`अब घर कैसे पहुंचोगे वह सोचो।`

`पहले कुछ खा लेंतो सोचें।`

सामने मटर का खेत था हीमोती उसमें घुस गया। हीरा मना करता रहापर उसने एक न सुनी। अभी दो ही चार ग्रास खाये थे कि आदमी लाठियां लिए दौड़ पड़े और दोनों मित्र को घेर लियाहीरा तो मेड़ पर था निकल गया। मोती सींचे हुए खेत में था। उसके खुर कीचड़ में धंसने लगे। न भाग सका। पकड़ लिया। हीरा ने देखासंगी संकट में है तो लौट पड़ा। फंसेंगे तो दोनों फंसेंगे। रखवालों ने उसे भी पकड़ लिया।

प्रातःकाल दोनों मित्र कांजी हौस में बंद कर दिए गए।

दोनों मित्रों को जीवन में पहली बार ऐसा साबिका पड़ा था कि सारा दिन बीत गया और खाने को एक तिनका भी न मिला। समझ में न आता थायह कैसा स्वामी है। इससे तो गया फिर भी अच्छा था। यहां कई भैंसे थींकई बकरियांकई घोड़ेकई गधेपर किसी के सामने चारा न थासब जमीन पर मुर्दों की तरह पड़े थे।

कई तो इतने कमजोर हो गये थे कि खड़े भी न हो सकते थे। सारा दिन मित्र फाटक की ओर टकटकी लगाए रहतेपर कोई चारा न लेकर आता दिखाई दिया। तब दोनों ने दीवार की नमकीन मिट्टी चाटनी शुरू कीपर इससे क्या तृप्ति होती।

रात को भी जब कुछ भोजन न मिला तो हीरा के दिल में विद्रोह की ज्वाला दहक उठी। मोती से बोला-`अब नहीं रहा जाता मोती !

मोती ने सिर लटकाए हुए जवाब दिया-`मुझे तो मालूम होता है कि प्राण निकल रहे हैं।`

`आओ दीवार तोड़ डालें।`

`मुझसे तो अब कुछ नहीं होगा।`

`बस इसी बूत पर अकड़ते थे !`

`सारी अकड़ निकल गई।`

बाड़े की दीवार कच्ची थी। हीरा मजबूत तो था हीअपने नुकीले सींग दीवार में गड़ा दिए और जोर मारा तो मिट्टी का एक चिप्पड़ निकल आया। फिर तो उसका साहस बढ़ा उसने दौड़-दौड़कर दीवार पर चोटें कीं और हर चोट में थोड़ी-थोड़ी मिट्टी गिराने लगा।

उसी समय कांजी हौस का चौकीदार लालटेन लेकर जानवरों की हाजिरी लेने आ निकला। हीरा का उद्दंड्डपन्न देखकर उसे कई डंडे रसीद किए और मोटी-सी रस्सी से बांध दिया।

मोती ने पड़े-पड़े कहा-`आखिर मार खाईक्या मिला?`

`अपने बूते-भर जोर तो मार दिया।`

`ऐसा जोर मारना किस काम का कि और बंधन में पड़ गए।`

`जोर तो मारता ही जाऊंगाचाहे कितने ही बंधन पड़ते जाएं।`

`जान से हाथ धोना पड़ेगा।`

`कुछ परवाह नहीं। यों भी तो मरना ही है। सोचोदीवार खुद जाती तो कितनी जाने बच जातीं। इतने भाई यहां बंद हैं। किसी की देह में जान नहीं है। दो-चार दिन यही हाल रहा तो मर जाएंगे।`
`हांयह बात तो है। अच्छातो ला फिर मैं भी जोर लगाता हूँ।`

मोती ने भी दीवार में सींग माराथोड़ी-सी मिट्टी गिरी और फिर हिम्मत बढ़ीफिर तो वह दीवार में सींग लगाकर इस तरह जोर करने लगामानो किसी प्रतिद्वंदी से लड़ रहा है। आखिर कोई दो घंटे की जोर-आजमाई के बाद दीवार ऊपर से लगभग एक हाथ गिर गईउसने दूनी शक्ति से दूसरा धक्का मारा तो आधी दीवार गिर पड़ी।

दीवार का गिरना था कि अधमरे-से पड़े हुए सभी जानवर चेत उठेतीनों घोड़ियां सरपट भाग निकलीं। फिर बकरियां निकलींइसके बाद भैंस भी खसक गईपर गधे अभी तक ज्यों के त्यों खड़े थे। 

हीरा ने पूछा-`तुम दोनों क्यों नहीं भाग जाते?`

एक गधे ने कहा-`जो कहीं फिर पकड़ लिए जाएं।`

`तो क्या हरज हैअभी तो भागने का अवसर है।`

`हमें तो डर लगता है। हम यहीं पड़े रहेंगे।`

आधी रात से ऊपर जा चुकी थी। दोनों गधे अभी तक खड़े सोच रहे थे कि भागेंया न भागेंऔर मोती अपने मित्र की रस्सी तोड़ने में लगा हुआ था। जब वह हार गया तो हीरा ने कहा-`तुम जाओमुझे यहीं पड़ा रहने दोशायद कहीं भेंट हो जाए।`

मोती ने आंखों में आंसू लाकर कहा-`तुम मुझे इतना स्वार्थी समझते होहीरा हम और तुम इतने दिनों एक साथ रहे हैं। आज तुम विपत्ति में पड़ गए हो तो मैं तुम्हें छोड़कर अलग हो जाऊं ?`
हीरा ने कहा-`बहुत मार पड़ेगीलोग समझ जाएंगेयह तुम्हारी शरारत है।`

मोती ने गर्व से बोला-`जिस अपराध के लिए तुम्हारे गले में बंधना पड़ाउसके लिए अगर मुझे मार पड़ेतो क्या चिंता। इतना तो हो ही गया कि नौ-दस प्राणियों की जान बच गईवे सब तो आशीर्वाद देंगे।`
यह कहते हुए मोती ने दोनों गधों को सींगों से मार-मार कर बाड़े से बाहर निकाला और तब अपने बंधु के पास आकर सो रहा। 

भोर होते ही मुंशी और चौकीदार तथा अन्य कर्मचारियों में कैसी खलबली मचीइसके लिखने की जरूरत नहीं। बसइतना ही काफी है कि मोती की खूब मरम्मत हुई और उसे भी मोटी रस्सी से बांध दिया गया।

एक सप्ताह तक दोनों मित्र वहां बंधे पड़े रहे। किसी ने चारे का एक तृण भी न डाला। हांएक बार पानी दिखा दिया जाता था। यही उनका आधार था। दोनों इतने दुर्बल हो गए थे कि उठा तक नहीं जाता थाठठरियां निकल आईं थीं। एक दिन बाड़े के सामने डुग्गी बजने लगी और दोपहर होते-होते वहां पचास-साठ आदमी जमा हो गए। तब दोनों मित्र निकाले गए और लोग आकर उनकी सूरत देखते और मन फीका करके चले जाते। 

ऐसे मृतक बैलों का कौन खरीददार होता ? सहसा एक दढ़ियल आदमीजिसकी आंखें लाल थीं और मुद्रा अत्यन्त कठोरआया और दोनों मित्र के कूल्हों में उंगली गोदकर मुंशीजी से बातें करने लगा। चेहरा देखकर अंतर्ज्ञान से दोनों मित्रों का दिल कांप उठे। वह क्यों है और क्यों टटोल रहा हैइस विषय में उन्हें कोई संदेह न हुआ। दोनों ने एक-दूसरे को भीत नेत्रों से देखा और सिर झुका लिया।

हीरा ने कहा-`गया के घर से नाहक भागेअब तो जान न बचेगी।मोती ने अश्रद्धा के भाव से उत्तर दिया-`कहते हैंभगवान सबके ऊपर दया करते हैंउन्हें हमारे ऊपर दया क्यों नहीं आती ?`

`भगवान के लिए हमारा जीना मरना दोनों बराबर है। चलोअच्छा ही हैकुछ दिन उसके पास तो रहेंगे। एक बार उस भगवान ने उस लड़की के रूप में हमें बचाया था। क्या अब न बचाएंग ?`
`यह आदमी छुरी चलाएगादेख लेना।`

`तो क्या चिंता है ? मांसखालसींगहड्डी सब किसी के काम आ जाएगा।`

नीलाम हो जाने के बाद दोनों मित्र उस दढ़ियल के साथ चले। दोनों की बोटी-बोटी कांप रही थी। बेचारे पांव तक न उठा सकते थेपर भय के मारे गिरते-प़डते भागे जाते थेक्योंकि वह जरा भी चाल धीमी हो जाने पर डंडा जमा देता था।

राह में गाय-बैलों का एक रेवड़ हरे-भरे हार में चरता नजर आया। सभी जानवर प्रसन्न थेचिकनेचपल। कोई उछलता थाकोई आनंद से बैठा पागुर करता था कितना सुखी जीवन था इनकापर कितने स्वार्थी हैं सब। किसी को चिंता नहीं कि उनके दो बाई बधिक के हाथ पड़े कैसे दुःखी हैं।

सहसा दोनों को ऐसा मालूम हुआ कि परिचित राह है। हांइसी रास्ते से गया उन्हें ले गया था। वही खेतवही बागवही गांव मिलने लगेप्रतिक्षण उनकी चाल तेज होने लगी। सारी थकानसारी दुर्बलता गायब हो गई। आह ! यह लो ! अपना ही हार आ गया। इसी कुएं पर हम पुर चलाने आया करते थेयही कुआं है।

मोती ने कहा-`हमारा घर नजदीक आ गया है।`

हीरा बोला -`भगवान की दया है।`

`मैं तो अब घर भागता हूँ।`

`यह जाने देगा ?`

इसे मैं मार गिराता हूँ।

`नहीं-नहींदौड़कर थान पर चलो। वहां से आगे हम न जाएंगे।`

दोनों उन्मत्त होकर बछड़ों की भांति कुलेलें करते हुए घर की ओर दौड़े। वह हमारा थान है। दोनों दौड़कर अपने थान पर आए और खड़े हो गए। दढ़ियल भी पीछे-पीछे दौड़ा चला आता था।
झूरी द्वार पर बैठा धूप खा रहा था। बैलों को देखते ही दौड़ा और उन्हें बारी-बारी से गले लगाने लगा। मित्रों की आंखों से आनन्द के आंसू बहने लगे। एक झूरी का हाथ चाट रहा था।

दढ़ियल ने जाकर बैलों की रस्सियां पकड़ लीं। झूरी ने कहा-`मेरे बैल हैं।`

`तुम्हारे बैल कैसे हैं ? मैं मवेसीखाने से नीलाम लिए आता हूँ।`

``मैं तो समझता हूँचुराए लिए जाते हो! चुपके से चले जाओमेरे बैल हैं। मैं बेचूंगा तो बिकेंगे। किसी को मेरे बैल नीलाम करने का क्या अख्तियार हैं ?`

`जाकर थाने में रपट कर दूँगा।`

`मेरे बैल हैं। इसका सबूत यह है कि मेरे द्वार पर खड़े हैं।

दढ़ियल झल्लाकर बैलों को जबरदस्ती पकड़ ले जाने के लिए बढ़ा। उसी वक्त मोती ने सींग चलाया। दढ़ियल पीछे हटा। मोती ने पीछा किया। दढ़ियल भागा। मोती पीछे दौड़ागांव के बाहर निकल जाने पर वह रुकापर खड़ा दढ़ियल का रास्ता वह देख रहा थादढ़ियल दूर खड़ा धमकियां दे रहा थागालियां निकाल रहा थापत्थर फेंक रहा थाऔर मोती विजयी शूर की भांति उसका रास्ता रोके खड़ा था। गांव के लोग यह तमाशा देखते थे और हँसते थे। जब दढ़ियल हारकर चला गया तो मोती अकड़ता हुआ लौटा। हीरा ने कहा-`मैं तो डर गया था कि कहीं तुम गुस्से में आकर मार न बैठो।`

`अब न आएगा।`

`आएगा तो दूर से ही खबर लूंगा। देखूंकैसे ले जाता है।`

`जो गोली मरवा द ?`

`मर जाऊंगापर उसके काम न आऊंगा।`

`हमारी जान को कोई जान ही नहीं समझता।

`इसलिए कि हम इतने सीधे हैं।`

जरा देर में नाँदों में खली भूसाचोकर और दाना भर दिया गया और दोनों मित्र खाने लगे। झूरी खड़ा दोनों को सहला रहा था। वह उनसे लिपट गया। 

झूरी की पत्नी भी भीतर से दौड़ी-दौड़ी आई। उसने ने आकर दोनों बैलों के माथे चूम लिए।

(स्वर : श्री सतेंद्र दहिया )
    

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