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प्रगतिशील परंपरा के जनक – सम्‍पूर्ण कथाकार प्रेमचंद

प्रेमचंद ने हमें केवल जनता का साहित्य ही नहीं दिया, वरन् साहित्य कैसी भाषा में लिखा जाना चाहिए, उसका भी पथ-निर्देश किया है । जनता द्वारा बोले जाने वाले कितने ही शब्दों को, उनकी कुटिया-मड़ैया से घसीटकर वह सरस्वती-मंदिर में लाए और यों ही, कितने अधिकारी शब्दों को, जो केवल बड़प्पन का बोझ लिए हमारे सिर पर सवार थे, इस मंदिर से निकाल-बाहर किया।

-         रामवृक्ष बेनीपुरी

 

हिंदी में प्रेमचंद सर्वश्रेष्ठ उपन्यासकार हैं और उनका `गोदान` सर्वश्रेष्ठ उपन्यास। उपन्यास के क्षेत्र में उनके योगदान को देखकर बंगाल के प्रसिद्ध उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें `उपन्यास सम्राट` कहकर संबोधित किया था। प्रेमचंद 31 जुलाई, 1880 को बनारस के लमही गांव के एक साधारण परिवार में पैदा हुए थे। उनकी शिक्षा का प्रारंभ एक मौलवी के मदरसे में अरबी-फारसी की शिक्षा से हुआ। वर्ष 1909 में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. की परीक्षा द्वितीय श्रेणी से पास की। वे उर्दू, हिंदी, अँग्रेज़ी, फारसी, अरबी, रशियन, मराठी, कन्नड़, बांग्ला इत्यादि भाषा पूरे अधिकार के साथ बोलते और लिखते थे । वे जीवन के मर्म को जानते थे । उनके अनुसार जीने का मतलब रोना नहीं, हंसना था । उनके जोर से हंसने तथा क़हक़हे लगाने के कारण उनके मित्र उन्हें बंबूक, अट्टहास लगाने वाला, कहते थे ।

प्रेमचंद ही वे पहले कथाकार हैं, जिन्होंने आधुनिक समाज में सबसे पहले स्त्री-पुरूष की समानतावादी भूमिका को समझा और वह भी तब जबकि यूरोप में स्त्री मताधिकार की मांग तो मानी जा चुकी थी, लेकिन स्त्री-पुरुष मुक्ति आंदोलनों ने जोर नहीं पकड़ा था। यूरोप, अमेरिका और फ्रांस में स्त्री को तलाक का कानूनी अधिकार और गर्भधारण के अधिकार को लेकर जो बहसें हुईं वे प्रेमचंद के जाने के बाद रंग लायीं । आज के स्त्री विमर्श ने जहां प्रतिशोध और तिरस्कार से लेकर यौन नैतिकता के अतिक्रमण के दावे और अंतत: संयत हो जाने की लंबी यात्रा की है, और आज का लेखक समाज में स्त्री समानता को लेकर पर्याप्त जागरूक है, लेकिन प्रेमचंद जिस समय स्त्री विमर्श पर लिख रहे थे वह अपने समय कहीं आगे की सोच थी ।

प्रेमचंद हिंदू और मुसलमान के बीच एक मजबूत संयोजक चिह्न थे। वे उर्दू में `नवाब राय` के नाम से और हिंदी में `प्रेमचंद` के नाम से लिखते थे। उन्होंने हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं को आत्मसात किया । यही कारण है कि आज प्रेमचंद का जो स्थान हिंदी में है वहीं उर्दू में भी है । उर्दू का कथा साहित्य का इतिहास प्रेमचंद से ही शुरू होता है । वे पहले उर्दू में ही लिखते थे और हिंदी में खुद उसका अनुवाद करते थे ।

प्रेमचंद ने कथा-साहित्य के साथ-साथ साहित्य के उद्देश्य और उसके विभिन्न पक्षों पर भी गंभीरतापूर्वक विचार किया था । साहित्य के उद्देश्य के बारे में उनका कहना था कि जिस साहित्य से हमारी सुरुचि न जागे, आध्‍यात्‍मिक और मानसिक तृप्ति न मिले, हममें शक्ति और गति न पैदा हो, हमारा सौंदर्य प्रेम न जागृत हो, जो हममें सच्चा संकल्प और कठिनाइयों पर विजय पाने की सच्ची दृढ़ता न उत्पन्न करे, वह आज हमारे लिए बेकार है, वह साहित्य कहने का अधिकारी नहीं है ।

प्रेमचंद का नाम हिंदी साहित्य के उन गिने-चुने रचनाकारों में सम्मिलित है, जिनकी रचनाओं को देशी भाषाओं के अतिरिक्त कई विदेशी भाषाओं में भी सम्मान मिला है । प्रेमचंद विश्व साहित्य में हिंदी और भारतीय साहित्य का प्रतिनिधित्व करने वाले रचनाकार हैं । वे पहले हिंदी लेखक थे, जिन्होंने पश्चिम की पूंजीवादी एवं औद्योगिक सभ्यता के संकट को पहचाना और देशवासियों का ध्यान आकर्षित किया । उनकी रचनाओं को जापानी, रूसी, जर्मनी, फ्रेंच, अंग्रेजी, चीनी इत्यादि विदेशी भाषाओं में अनूदित किया जा चुका है ।

वे हिंदी को केवल हिंदी प्रदेशों की भाषा बनाए रखना नहीं चाहते थे । उनकी आंखों में हिंदी को अखिल भारतीय भाषा बनाने का सपना था । प्रेमचंद मानते थे कि आजादी की लड़ाई हिंदू-मुस्लिम एकता को आधार बनाकर ही लड़ी जा सकती है । अंग्रेज सरकार इस एकता को तोड़ने के लिए भाषाई फूट का सहारा ले रही है । वे कहते हैं, बोलचाल की उर्दू और हिंदी में कोई फर्क नहीं है । मुसलमान बेहद सुविधाजनक रूप से हिंदी के शब्दों का प्रयेाग करते हैं और हिंदू भी आम बोलचाल की भाषा में धडल्ले से उर्दू का प्रयोग करते हैं । इसलिए इन भाषाओं को अलग-अलग कहकर उनके बीच धार्मिक असहिष्णुता की दीवार खड़ी करना राष्ट्रीय आंदोलन की राह में दीवार खड़ी करना है ।

भाषा के क्षेत्र में शुद्धिकरण का विरोध करते हुए प्रेमचंद ने कहा था कि शुद्ध हिंदी तो निरर्थक शब्द है। जब भारत शुद्ध हिंदू होता तो उसकी भाषा शुद्ध हिंदी होती । जब तक यहां मुसलमान, ईसाई, फारसी, अफगानी सभी जातियां मौजूद हैं, हमारी भाषा भी व्यापक रहेगी । अगर हिंदी भाषा प्रांतीय रहना चाहती है तब तो यह शुद्ध बनायी जा सकती है । उसका अंग-अंग करके उसका कायाकल्प करना होगा । प्रौढ़ से वह फिर शिशु बनेगी यह असंभव है, हास्‍यास्पद है । हमारे देखते-देखते सैकड़ों विदेशी शब्द भाषा में आ घुसे, हम उन्हें रोक नहीं सकते । उनका आक्रमण रोकने की चेष्टा व्यर्थ है ।

प्रेमचंद की पहली कहानी पुस्तक `सोजेवतन` का प्रकाशन वर्ष 1908 में हुआ, जो अंग्रेजी सत्ता के द्वारा जब्तशुदा बना ली गई। वर्ष 1900 से 1936 के 36 वर्षों के रचनाकाल में उन्होंने विपुल कथा साहित्य की रचना की, बाल साहित्य लिखा, आलोचना ग्रंथों की रचना की और `हंस` जैसी पत्रिका का सफल संपादन भी किया । छोटे-बड़े कुल 15 उपन्यास, 3 नाटक, 7 बाल पुस्‍तकें, 10 अनुवाद, 300 से अधिक कहानियां और संपादकीय लेख, निबंध, भाषण, भूमिकाएं, पत्राचार आदि विभिन्न विधाओं में संचित हजारों पृष्ठों की विविध सामग्री के विपुल साहित्य के साथ प्रेमचंद का लेखन खुद प्रेमचंद से कहीं अधिक हिंदी की पहचान बन गया है।

उनकी रचनाएं इस प्रकार हैं - उपन्यास- प्रेमा, सेवासदन, वरदान, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कायाकल्प, निर्मला, प्रतिज्ञा, गबन, कर्मभूमि, गोदान और मंगलसूत्र (अपूर्ण)कहानी संग्रह- मानसरोवर आठ भाग तथा गुप्त धन में प्रेमचंद की सभी कहानियां संग्रहीत हैं। नाटक- कर्बला, संग्राम, प्रेम की वेदी, रूठी रानी। निबंध संग्रह- स्वराज के फायदे, कुछ विचार, साहित्य का उद्देश्य । जीवनियां- महात्मा शेखसादी, दुर्गादास, कलम, तलवार और त्यागसंपादित- मनमोदक, गल्‍प समुच्चय, गल्प रत्न। अनुदित- अहंकार, सृष्‍टि का प्रारंभ, आजाद कथा, सुखदास, चांदी की डिबिया, हड़ताल, न्याय, पिता के पत्र पुत्री के नाम।

प्रेमचंद को पेट की असाध्य बीमारी थी। इस बीमारी के कारण लेखन में बाधा तो पड़ती थी, लेकिन जैसे ही उन्हें कुछ आराम होता वे लिखने में जुट जाते। पेचिश की बीमारी के कारण 8 अक्‍तूबर, 1936 को इस कलम के सिपाही ने अपनी अंतिम सांस ली। उनके निधन पर डॉ; राजेंद्र प्रसाद ने सर्चलाइट में लिखा था, ` ईंट, चूना, कंकड़ और पत्थर के स्मारक में कुछ नहीं रखा । प्रेमचंद के स्मारक का प्रश्न जनता के सामने उपस्थित है। हमारी समझ में उनका सर्वोत्तम स्मारक यही होगा कि जो कार्य वह अधूरा छोड़ गए हैं, उसे हम पूरा करें । `

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